विज्ञानमेव जयते की खोज किसने की और कब की?


पूर्वी चम्पारण ( बिहार):- विज्ञानमेव जयते की खोज एवं विज्ञानमेव जयते वैज्ञानिक अनुसंधान विषय का अध्ययन प्रथम बार जून 2006 से बिहार राज्य के बखरी कल्याणपुर पू.चम्पारण बिहार निवासी डाॅ बासुदेव कुमार शर्मी ने शुभारंभ की एवं 07जून 2011 को पाॅच वर्षीय अध्ययन रिपोर्ट भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती देवी प्रतीभा सिंह पाटिल को समर्पित की। 09 जून 2011को विज्ञानमेव जयते की अतुलनीय वैज्ञानिक अनुसंधान एवं खोज के लिए डाॅ बासुदेव कुमार शर्मा को सम्मानित की। प्रत्येक वित्तीय वर्ष अध्ययन रिपोर्ट ,विज्ञान प्रसार ,विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत सरकार को समर्पित करते रहे, भारत सरकार का आदेश आया कि वैज्ञानिक के स्थायी निवासस्थल जिला के जिलाधिकारी एवं सांसद की जांच एवं सहमति पत्र आवश्यक है। 

 भारत सरकार के आदेशानुसार पूर्वी चंपारण बिहार के तत्कालीन माननीय सांसद श्री राधामौहन सिंह जी ने लिखित पत्र विज्ञान प्रसार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत सरकार को समर्पित कर वैज्ञानिक चंपारण बनाने में अतुलनीय सहयोग की। 

तत्कालीन जिलाधिकारी श्री अभिजीत कुमार ने ऐसे अतुलनीय अनुसंधान के लिए बिना देर किये फरवरी 2014 में प्रथम पत्र एवं अगस्त 2014 में भारत सरकार को विज्ञानमेव जयते के पेटेंट के लिए आग्रह पत्र सौंपे। 19 फरवरी 2015 को भारत के समाचार पत्रो के पंजीयक, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार नें विश्व की प्रथम सत्यमेव जयते की तरह विज्ञानमेव जयते की पेटेंट निबंधन कर वैज्ञानिक भारत बनाने मार्ग प्रशस्त की। 20 फरवरी 2015 को श्री एस0 एम0 खान ,भारत के समाचार पत्रों के महापंजीयक, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार नें डाॅ बासुदेव कुमार शर्मा को प्रधान संपादक, प्रकाशक, मुद्रक के रूप में निबंधित कर नियुक्त किया । आज विज्ञानमेव जयते विश्व का प्रथम अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक मासिक पत्रिका सह शोध एवं अनुसंधान पत्र बन गया है। यानि विज्ञानमेव जयते की चिर स्थापना में कुल 09 नौ वर्ष लगे। कुल मिलाकर आज 2026 को बीस वर्ष पूर्ण हो गए । डाॅ बासुदेव कुमार शर्मा दुनियाभर में भारतीय वैज्ञानिकों के स्मृति चिह्न बनकर तिरंगा लहराया है, सम्पूर्ण विश्व में भारत का वैज्ञानिक परचम सदैव कायम रहेगा....


     वैज्ञानिक अनुसंधान एवं खोज की इतिहास अति प्राचीन है। वैज्ञानिक खोज, अनुसंधान की इतिहास, आधुनिक भारतीय कालखंड में 5000 पांच हजार वर्ष पुरानी है, खासकर वैज्ञानिक बिहार का इतिहास महाभारत काल से माना जाता रहा है। 

       

       बिहार की प्राचीन वैज्ञानिक और बौद्धिक परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। इस भूमि ने गणित, खगोल विज्ञान (एस्ट्रोनॉमी), और चिकित्सा के क्षेत्र में विश्व को कई महान वैज्ञानिक और विद्वान दिए हैं, जिनमें आर्यभट्ट, बौधायन, चरक, सुश्रुत और कौमारभृत्य जीवक प्रमुख हैं。बिहार से जुड़े प्राचीन वैज्ञानिकों और उनके योगदानों की प्रमुख सूची निम्नलिखित है:

■ आर्यभट्ट (Aryabhata): इनका जन्म 476 ईस्वी में बिहार के कुसुमपुरा (वर्तमान पटना) में हुआ था。 इन्होंने खगोल विज्ञान और गणित पर 'आर्यभटीय' और 'आर्य-सिद्धांत' नामक प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं。 उन्होंने ही सर्वप्रथम 'शून्य' को दशमलव प्रणाली में प्रस्तुत किया, π (पाई) का मान 3.14 निर्धारित किया और तर्क दिया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है ।


■ बौधायन (Baudhayana): ये सीतामढ़ी जिले के बनगांव से थे。 इन्होंने ज्यामिति (Geometry) के प्रसिद्ध पाइथागोरस प्रमेय (Pythagorean theorem) से सदियों पहले 'बौधायन प्रमेय' की खोज की थी, जिस पर अंतरिक्ष विज्ञान की गणनाएं आधारित थीं ।


■ चरक (Charaka): प्राचीन काल के महान चिकित्सक (Physician) थे。 इन्होंने आयुर्वेद पर 'चरक संहिता' की रचना की, जो चिकित्सा और शरीर विज्ञान पर एक प्रामाणिक ग्रंथ है।


■ सुश्रुत (Sushruta): इन्हें विश्व के 'शल्य चिकित्सा' (Surgery) का जनक माना जाता है । इन्होंने 'सुश्रुत संहिता' में शल्य चिकित्सा के विभिन्न उन्नत तरीकों, औजारों और प्लास्टिक सर्जरी का विस्तार से वर्णन किया है।


■ कौमारभृत्य जीवक (Jivaka): ये प्राचीन नालंदा के एक महान चिकित्सक थे, जो भगवान बुद्ध और सम्राट बिम्बिसार के निजी वैद्य (Physician) थे । चिकित्सा विज्ञान और बाल चिकित्सा (Paediatrics) के क्षेत्र में इनका योगदान अतुलनीय था।


■ सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (Moːkśguṇam Viśveśvarayya; 15 सितंबर 1861 – 12/14 अप्रैल 1962), जिन्हें उनके आद्याक्षर, एमवी से भी संदर्भित किया जाता है, एक भारतीय सिविल इंजीनियर , प्रशासक और राजनेता थे, जिन्होंने 1912 से 1918 तक मैसूर के 19वें दीवान के रूप में कार्य किया। विश्वेश्वरैया, जिनकी उम्र 40 वर्ष के आसपास थी।

■■VIGYANMEV JAYATE-20/07/2026 ■■